बुधवार, 30 जून 2010

उछलकर छींट कीचड़ की

मित्रो,बहुत दिनों बाद आज फिर आप से मुखातिब होने का मौका मिला है। अपनी एक ताज़ा ग़ज़ल आप तक पहुंचाने का मन कर रहा है। तो लीजिये पेशे खिदमत है मेरी ये ग़ज़ल। अच्छी लगे तो ...........


उछलकर छींट कीचड़ की तुम्हारी ओर आई है

तुम्हारे हाथ के पत्थर की इतनी सी कमाई है

सियासत खून पीती है हमारा तो ग़लत क्या है
दरख्ते ज़िन्दगी पर बेल हमने ख़ुद चढ़ाई है

झकाझक है शहर सारा सजी है हर गली इसकी
अमीरे शहर की बेटी की, लगता है, सगाई है

ज़माने भर की सुन्दरता हमें अच्छी नहीं लगती
हमारी आँख में जबसे तेरी सूरत समाई है

अगन ये इश्क की बुझती नहीं दरिया के पानी से
ये पानी से नहीं प्यासे से प्यासे की लड़ाई है

कहीं दौलत की फिसलन है कहीं पर हुस्न की फिसलन
कि राहे ज़िन्दगी पर हर जगह काई ही काई है

हमारे दिल की अंगनाई को छोटा कर गयी कितना
न जाने मज़हबी दीवार ये किसने उठाई है

अधिक क्या पढ़ गए माँ-बाप से कटने लगे बच्चे
बताओ इस ज़माने की 'तरल' कैसी पढ़ाई है

10 टिप्‍पणियां:

  1. सच्ची और बहुत बहुत अच्छी ग़ज़ल - बधाई

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  2. बहुत अच्छी गजल कहने लगे हैं आप कुछ दिन से

    समझ लें आप की यह बेशकीमत सी कमाई है

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  3. क्‍या झकाझक गजल कहीं है आपने
    तरल
    सच कहूं झकाझक को खूब पसंद आई है

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  4. बहुत ख़ूबसूरत मत्ला और उस पर ये शेर

    सियासत खून पीती है हमारा तो ग़लत क्या है
    दरख्ते ज़िन्दगी पर बेल हमने ख़ुद चढ़ाई है

    बहुत बढ़िया और सच्चा है

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  5. डॉ.त्रिमोहन तरल जी
    नमस्कार !

    आपके ब्लॉग पर दो रचनाएं लगी हैं , दोनों ही ख़ूबसूरत !
    एक से बढ़ कर एक !
    बधाई स्वीकार करें ।

    सियासत खून पीती है हमारा तो ग़लत क्या है
    दरख्ते ज़िन्दगी पर बेल हमने ख़ुद चढ़ाई है

    वाह ! क्या शानदार शे'र कहा है !
    ज़माने भर की सुंदरता हमें अच्छी नहीं लगती
    हमारी आंख में जबसे तेरी सूरत समाई है

    इस मा'सूम शे'र ने दिल ले लिया है , डॉक्टर साहब !
    सुबहान अल्लाह !

    बुरा न मानें तो ध्यान दिलाना चाहूंगा -
    प्रस्तुत ग़ज़ल बह्रे-हज़ज में है , आप जानते ही हैं ।
    दो मिसरों में वज़्न के लिहाज़ से थोड़ी चूक हुई है -
    छींटकीचड़ की उछली है तुम्हारी ओर आई है

    आतिशे इश्क़ तो बुझती नहीं दरिया के पानी से

    आशा है , मुझसे सहमत होंगे ।

    ब्लॉग संसार में आपका स्वागत है …
    शस्वरं पर भी आपका हार्दिक स्वागत है , आमंत्रण है , अवश्य आइएगा …

    - राजेन्द्र स्वर्णकार
    शस्वरं

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  6. कहीं दौलत की फिसलन है कहीं पर हुस्न की फिसलन
    कि राहे ज़िन्दगी पर हर जगह काई ही काई है

    bahut khoobsurat sher kaha hai aapne

    is gazal ke kuch sher bade pasand aaye

    ज़माने भर की सुन्दरता हमें अच्छी नहीं लगती
    हमारी आँख में जबसे तेरी सूरत समाई है

    waah khoob kaha hai

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  7. मैं इधर काफी समय से बाहर होने के कारण अपना ही ब्लॉग नहीं देख पाया। क्षमा प्रार्थी हूँ उसके लिए। इस बीच आप लोगों ने यहाँ आकर मेरी ग़ज़ल पर उपयुक्त टिप्पणियाँ कर मुझे कृतार्थ किया। राजेंद्र जी को विशेष धन्यवाद कुछ चूकों की ओर ध्यान आकृष्ट करने के लिए। मैंने दोनों मिसरों को दुरुस्त कर लिया है। अब आप उन्हें यों पढ़ सकते हैं :

    उछलकर छींट कीचड़ की तुम्हारी ओर आयी है (मतले का पहला शेर)

    अगन ये इश्क की बुझती नहीं दरिया के पानी से

    मेरे ख़याल से अब ये दोनों शेर बहरे हज़ज के मुताबिक हो गए हैं। श्रद्धा जी को भी बहुत-महत धन्यवाद जिन्हें इस ग़ज़ल के कुछ अशआर पसंद आये।

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  8. डॉ.त्रिमोहन तरल साहब ,
    नमस्कार !
    आभारी हूं आपका । सच्चे गुणियों का ऐसा निर्मल स्वभाव ही तो होता है । मेरी नादानी का बिल्कुल बुरा न मानते हुए मेरा मान भी रख दिया , और मन भी !
    पुनः आभार !
    राजेन्द्र स्वर्णकार
    समय निकाल कर शस्वरं पर पधारिए । आपके आगमन से मेरा भी मान बढ़ जाएगा ।

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  9. कहीं दौलत की फिसलन है कहीं पर हुस्न की फिसलन
    कि राहे ज़िन्दगी पर हर जगह काई ही काई है

    gzl ka swabhaav hi aisa rakkha hai aapne
    k baar baar padhne ko mn kartaa hai
    saarthak aur saneshmaee rachnaa par badhaaee.

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  10. सियासत खून पीती है हमारा तो ग़लत क्या है
    दरख्ते ज़िन्दगी पर बेल हमने ख़ुद चढ़ाई है

    कहीं दौलत की फिसलन है कहीं पर हुस्न की फिसलन
    कि राहे ज़िन्दगी पर हर जगह काई ही काई है

    इस निहायत ही खूबसूरत ग़ज़ल में तरल साहब बहुत लाजवाब शेर कहें हैं आपने...दिली दाद कबूल कीजिये...वाह...और आपके इस बेमिसाल शेर
    ज़माने भर की सुन्दरता हमें अच्छी नहीं लगती
    हमारी आँख में जबसे तेरी सूरत समाई है
    से मुझे शमीम जयपुरी साहब का एक शेर याद आ गया ..
    "तुझसे बढ़ के हंसी कौन है
    किसको देखूं तुझे देख कर"
    आज आपके ब्लॉग पर आना सार्थक हो गया, अब आना जाना लगा ही रहेगा...

    नीरज

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